मराठी बनाम गुजराती की चुनौती


महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों में से मुलुंड विधानसभा क्षेत्र बीजेपी के लिए सर्वाधिक सुरक्षित सीटों में से एक मानी जाती है। इसलिए यहां से बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटील का नाम भी उम्मीदवारी के लिए चल रहा था। पिछले 20 साल से इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व सरदार तारा सिंह करते आ रहे हैं। उम्र के कारण उनका टिकट काटकर बीजेपी ने मिहिर कोटेचा को उतारा है। गुजराती सांसद और उस पर गुजराती को विधानसभा की उम्मीदवारी देने से मराठी बनाम गुजराती हो चला है। वैसे, हालिया लोकसभा चुनाव में यहां से बीजेपी के मनोज कोटक को 1,27,667 वोट जबकि दूसरे नंबर पर रहने वाले कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के उम्मदीवार संजय पाटील को 40,484 वोट मिले। अब संजय पाटील शिवसैनिक बन गए हैं।

सरदार ने बनाया गढ़
सन 1990 में पहली बार यहां से बीजेपी के वामनराव परब ने विधानसभा चुनाव जीता। उसके बाद इस विधानसभा पर बीजेपी का कमल ही खिलता रहा है। किरीट सोमैया 1995 में विधायक चुने गए। 1984 से लगातार नगरसेवक चुने जाते रहे सरदार तारा सिंह 1999 ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा। उन्होंने यहां के मतदाताओं को मोह लिया। मुलुंड विधानसभा में शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र अछूता रहा हो, जहां सरदार तारा सिंह के विकास कार्य का बोर्ड न दिखाई दे। आज यहां से विपक्ष चुनौती देने की स्थिति में नहीं है, जबकि यह वह क्षेत्र है जहां से कभी कांग्रेस के दिग्गज आरआर सिंह मुंबई के महापौर बने थे।

बीजेपी के गढ़ को चुनौती नहीं
बीजेपी के इस गढ़ को भेदने की चुनौती विपक्ष के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है। सन 2014 के विधानसभा चुनाव में सरदार तारा सिंह को 93,850 वोट यानी 54.79 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के चरण सिंह सप्रा को 28,543 वोट यानी महज 16.66 प्रतिशत वोट मिले। सन 2009 के चुनाव में तो मनसे के सत्यवान दलवी दूसरे नंबर पर थे और कांग्रेस तीसरे नंबर पर चली गई थी। बीजेपी के इस गढ़ में विरोधी दल कांग्रेस महज एक खानापूर्ति करते हुए दिखाई दे रही है। इस बार कांग्रेस ने मुलुंड विधानसभा से गोविंद सिंह, मनसे ने हर्षला चव्हाण, बसपा ने श्रीरंग कांबले को उतारा है। यहां पर कुल 13 उम्मीदवार अपनी किस्मत अजमा रहे हैं।

जातीय समीकरण हावी
मुलुंड विधानसभा का मुकाबला इस बार गुजराती बनाम मराठी हो चला है। बीजेपी ने मिहिर चंद्रकांत कोटेचा को उतारा है। कोटेचा ने पिछला विधानसभा चुनाव वडाला से लड़ा था। जहां कांग्रेस के कालीदास कोलंबकर ने कोटेचा को 800 मतों के अंतर से हरा दिया था। हार के बाद कोटेचा बीजेपी को इतने प्रिय लगे कि उन्हें इस बार सर्वाधिक सुरक्षित सीट से उतार दिया, जबकि यहां से बीजेपी के वरिष्ठ नगरसेवक प्रकाश गंगाधरे मुख्य दावेदार थे, लेकिन गुजराती समुदाय के कोटेचा के सामने मराठी गंगाधरे को टिकट नहीं दिया गया। चर्चा है कि इस लोकसभा चुनाव क्षेत्र से गुजराती सांसद किरीट सोमैया का टिकट काटा तो बीजेपी ने गुजराती मनोज कोटक को उतारा, जबकि विधानसभा चुनाव में एक सरदार का टिकट काटा तब भी गुजराती उम्मीदवार उतारा। उत्तर पूर्व लोकसभा चुनाव क्षेत्र की छह में से बीजेपी ने दो सीटों पर गुजराती उम्मीदवार उतारे हैं जो न तो मराठी समुदाय को रास आ रहा है और न हिंदी भाषी समाज को। मामला पूरी तरह से गुजराती बनाम मराठी हो चला है। इसका कुछ फायदा एमएनएस उम्मीदवार हर्षला चव्हाण को मिल सकता है।

रिपोर्टर

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