मनोरंजन जगत में अपना वजूद तलाशती राजस्थानी फिल्में

फिल्में सदा से किसी भी संस्कृति के फैलाव का महत्वपूर्ण माध्यम रही हैं। लेकिन इस पैमाने पर यदि हम राजस्थानी फिल्मों का मूल्यांकन करें, तो परिणाम चिंताजनक दिखाई देता है। पूरी दुनिया में वीरता, त्याग और बलिदान की धरती के रूप में पहचाने जाने वाले राजस्थान की संस्कृति के फैलाव में राजस्थानी भाषा की फिल्में जो भूमिका अदा कर सकती थीं, वो अब तक नहीं कर पाईं हैं। सभी राजस्थानियों के लिए यह गर्व की बात है कि उनके पास विश्व की सबसे गौरवशाली ऐतिहासिक विरासतें हैं। स्वर्णाक्षरों में अंकित राजस्थान के लोकेशन और सिचुएशन आज की पीढ़ी के लिए भी जिज्ञासा और आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। यही कारण है कि मनोरंजन जगत के लिए राजस्थान की धरती हमेशा उर्वर भूमि साबित होती रही है। चाहे छोटा पर्दा हो या बड़ा पर्दा दोनों की सफलता में राजस्थानी संस्कृति एक मजबूत आधार रही है। हिंदी सिनेमा और टेलीविजन के इतिहास के हर दौर में राजस्थानी संस्कृति को दिखाती फिल्मों और धारावाहिकों ने लोकप्रियता का परचम लहराया है। ऐसे में यह काफी विचारणीय पहलू है कि जब हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक फिल्म के मद्देनजर आज भी राजस्थान के यशस्वी विरासत को भुनाने के लिए एक सुरक्षित आधार मान रहे हैं, तो क्या राजस्थानी संस्कति में ही पले- बढ़े और इसी की समृद्धि के लिए समर्पित लोग ये काम नहीं कर सकते ? बिल्कुल कर सकते हैं। लेकिन उनके सामने फिल्म निर्माण के हर स्तर पर समस्याएं मुंह फैलाये खड़ी हैं। बस जरूरत है उन्हें मजबूत संबल देने की। यहां सवाल केवल राजस्थानी संस्कृति के राजस्थान से बाहर फैलाव के संदर्भ में नहीं है, अपितु राजस्थान और अन्य प्रदेशों-देशों में पलने वाली नयी पीढ़ी से जुड़ा है, क्योंकि मातृभाषा ही परम्पराओं और संस्कृति से जोड़े रखने की एक मात्र कड़ी है l मातृभाषा के भीतर भावना,  विचार  और जीवन पद्धति शामिल रहती है l 



 मनोवैज्ञानिकों की यह स्पष्ट मान्यता है कि संप्रेषण की भाषा वही होना चाहिए, जिस भाषा में संबंधित व्यक्ति सोचता और चिंतन मनन करता है l वे मानते हैं कि इससे संप्रेषणीयता सटीक और सहज तो होती ही है, साथ-साथ व्यक्ति की ग्रहण क्षमता और कार्य क्षमता भी अधिक होती है । मातृभाषा बच्चों को आत्मविश्वासी और योग्य बनाती है l इस लिहाज से देखें तो राजस्थानी संस्कृति का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरण राजस्थानी भाषा में ही होना जरूरी है। भारत रत्न स्व.डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम भी बच्चों में रचनात्मकता का विकास करने और उनकी ग्रहण क्षमता को विकसित करने के लिए मातृभाषा की वकालत करते थे। संस्कृति के बारे में कहा जाता है कि यह हमारे पूर्वजों के श्रेष्ठ विचारों और कर्मों की धरोहर है। यह संस्कृति अपनी भाषा के जरिए जीवित रहती है | देश की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों के बरक्स यदि राजस्थानी फिल्मों का सिंहावलोकन करें, तो हम पाते हैं कि हमारी शुरुआत किसी अन्य के मुकाबले बहुत देर से नहीं हुई है। पहली राजस्थानी फिल्म सन 1942 में ही आ गई थी, लेकिन सफर पर नजर दौड़ाते ही चित्र आशानुकूल नहीं दिखता। आज दक्षिण भारत की फिल्में हिंदी सिनेमा को टक्कर दे रही हैं। इसी तरह बंगला और उड़िया भाषा की फिल्में देश के राष्ट्रीय पुरस्कारों में अपना झंडा फहरा रही हैं। भोजपुरी फिल्मों की तो शुरुआत भी काफी साल बाद, सत्तर के दशक में मानी जाती है, लेकिन प्रदर्शन के स्तर पर सात समुदंर पार पहुंच गई हैं। दूसरी तरफ राजस्थानी फिल्में अपने ही प्रदेश में दुर्दशा की शिकार हैं और उपेक्षित होकर आज भी अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रही हैं। इसके कई कारण हैं। अन्य प्रांतों की सरकारों ने अपनी भाषा की फिल्मों के लिए तमाम सहूलियत देने के साथ ही राज्य के थियेटरों के लिए भी गाइडलाइन जारी कर दिया, जिसे हर हाल में उन्हें मानना होता है। इससे संबंधित भाषा की फिल्मों को दर्शकों की उपलब्धता सुनिश्चित हो गई है। देश के आर्थिक विकास में सबसे बड़ा योगदान देने वाले राजस्थानियों की अपनी ही भाषा की फिल्मों की दयनीय स्थित पर आज सबको गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

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