अदालत ने नाबालिग से लैंगिक अत्याचार के आरोपी की जमानत याचिका नकारी

 मुंबई। नाबालिग के साथ हुए लैंगिक अत्याचार मामले में अगर पीड़ित एफआईआर या पुलिस को दिए हुए स्टेटमेंट मेंआरोपी का नाम गलत बताती है तो उसका कोई भी महत्व नहीं है। लेकिन वह उसकी पहचान कर ले और न्यायालय में आरोप सिद्ध होना महत्वपूर्ण है। ऐसा एक महत्वपूर्ण निर्णय उच्च न्यायालय ने अभी के दिनों में दिया है। चेंबूर के एक ज्यूनियर कॉलेज के लैंगिक अत्याचार मामले में आरोपी को दोषी ठहराते हुए उदयकुमार चंद्रपाल्या को 10 साल की सजा सुनाई थी। जिसके खिलाफ उदय हाईकोर्ट में गए हुए थे और सुनवाई चलने तक जमानत की मांग की थी। लेकिन अदालत में न्यायाधीश पृथवीराज चौहान ने यह क्लियर किया है। चेंबूर के एक डॉक्टर की शिकायत के आधार पर आरसीएफ पुलिस ने तीन साल पहले उदयकुमार और बालकृष्ण बाइत के खिलाफ मामला दर्ज किया था। दोनों के खिलाफ पॉक्सो अदालत में मामला चल रहा था। जहां पर दोनों को दोषी ठहराया गया था। न्यायाधीश एम एच मोरे ने दोनों को 10 साल की सजा सुनाई थी। जिसके खिलाफ उदयकुमार ने उच्चन्यायालय में अपील की थी। उसमें मनंग की थी कि सजाका पर तत्कालीन रूप से स्थगिति दी जाए और मामला अदालत में चलने तक जमानत दी जाए। लेकिन इसिपर सुनवाई करते हुए न्यायफहिश चव्हाण सुनवाई के अंत में अपील को खारिज कर दी है। आरोपी के अपराध करने का तरीका और अपराध को देखते हुए जमानत पर छोड़ना ठीक नहीं है। ऐसा व्यक्ति समाज के लिए धोखादायक है। वह फिर से इसी प्रकार की घटना को अंजाम दे सकता है यह भी हो सकता है। लेकिन अगर कोई जमानत पर रहते हुए नियमों का उल्लंघन न किया हो तो उसे फिर से जमानत देने के लिए पात्र है ऐसा नहीं। ऐसा निरीक्षण न्यायाधीश चव्हाण ने अपने आदेश में कहा है।  पीड़ित नाबालिग ने आरोपी के खिलाफ स्टेटमेंट देते हुए उसका नाम गणेश बताया था। लेकिन उसका असली नाम उदयकुमार है ऐसा दोषी के वकील अदालत के सामने रखा था। लेकिन पीड़ित नाबालिग ने पहचान परेड में आरोपी को पहचाना और अदालत में भी उसे पहचाना। इतना ही नहीं अत्याचार करनेवाले स्कूल वैनवाले अंकल के साथ रहनेवाले अंकल यही थे ऐसा उसने अदालत में कहा है। इस वजह से उसने सिर्फ नाम गलत बताया यह कोई महत्वपूर्ण नहीं है ऐसा युक्तिवाद सरकारी वकील माधवी म्हात्रे ने अदालत में किया। इसे सुनने के बाद न्यायमूर्ति ने उदय की विनती को नकार दिया।

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