जीवन में सफल होने वालों को ही परीक्षा देनी पड़ती है : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज


 

मुंबई।  विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में बाला साहेब ठाकरे मैदान, भायंदर पूर्व में  हो रही श्रीमद् भागवत कथा सुनाते

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने चौथे दिन प्रभु के वामन अवतार का विस्तार पूर्वक वर्णन किया।  साथ ही कृष्ण जन्मोत्सव भी बड़ी धूमधाम से मनाया गया।

पूज्य  श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि झूठे जगत का त्याग जितनी जल्दी कर दो उतना अच्छा है । क्योंकि हम सबके पीछे उस दिन से काल पड़ा है, जिस दिन से हमारा जन्म हुआ है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि एक भक्त ने प्रश्न किया कि हम भक्ति करते हैं तो हमें परीक्षा क्यों देनी पड़ती है, कितनी परीक्षाएं हमको देनी हैं ? तो इसका सुंदर उत्तर यही है कि कुछ बातें हमेशा याद रखनी चाहिए कि इस संसार में सिर्फ सफल होने वालों को ही परीक्षा देनी पड़ती है, असफल होने वालों को तो देनी ही नहीं पड़ती । वो तो आराम से घर बैठते हैं। परीक्षा उसको ही देनी है, जिसे सफल होना है। संसार रोकता है भक्ति करने से, संसार इसलिए रोकता है क्योंकि तुम रूक जाते हो। मीरा कहां रूक पाई थी, ध्रुव कहां रूक पाए थे, प्रह्लाद कहां रूक पाए थे, जब उनके सर पर धुन सवार हुई तो निकल गए थे वो भक्ति करने को। आप मुझे एक भक्त का नाम बता दो जिसे भक्ति करने से ना रोका गया हो।


महाराज श्री ने कहा कि अगर वाकई भक्ति करना चाहते हो तो सबसे बड़ी बात ये है कि तुम्हे पता होना चाहिए कि तुम सही कर रहे हो। तुम्हारी आत्मा इस बात की गवाही दे कि तुम सही कर रहे हो, तो फिर रूकना मत। गोपियां अगर ग्वालों के रोकने से रूक जातीं तो वो कृष्ण को कभी प्राप्त नहीं कर पातीं।

 

देवकीनंदन ठाकुर जी ने बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारों में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रह्लाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला प्रभु, मैं इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा कि अगर तुम सदैव के लिए तीनों लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पूरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक और कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।

महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा, मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा आप अपनी इच्छा बताइये।उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं

महाबली ने हँसते हुए कहा केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।

दूसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।

महाबली ने उस बालक से कहा प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

आज की भागवत आरती मुख्य यजमान रजनीश त्रिपाठी, विजया रजनीश त्रिपाठी, सहयजमान माया मुरारी लाल पांडला, हेमलता दिनेश शर्मा, इंदु सुभाष चेजारा, माया रमा प्रसाद सक्सैना ने उतारी। साथ में अयोध्या प्रसाद सेठ, गजेन्द्र भंडारी, राम जीवन लाल सोनी,छुट्टन लाल शरण शर्मा, अमर पांडे, शुभाष शरण, हीराकांत शरण झा, पिंटू शरण गुप्ता, राकेश शरण शर्मा, बनवारी अजय शरण गौड़ सामौता, विनोद शरण सिंह, जनार्दन शरण पाठक, सुशील यादव, माया सक्सेना, दिनेश शर्मा, नीलम चौधरी, रेखा शर्मा, शेष नारायण गुप्ता, कोकिला सोनी, राजेश मेवाडा, प्रह्लाद सिसोदिया, जागृति ठक्कर, आयुष शाह, मोनू सोनी समेत समस्त समिति सदस्य मौजूद रहे।

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