भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।


भागवत आरती के मुख्य यजमान रजनीश त्रिपाठी, विजया रजनीश त्रिपाठी, सहयजमान माया मुरारी लाल पांडला, हेमलता दिनेश शर्मा, इंदु सुभाष चेजारा, माया रमा प्रसाद सक्सैना ने उतारी, साथ में अयोध्या प्रसाद सेठ, राम जीवन लाल सोनी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे।

श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि झूठे जगत का त्याग जितनी जल्दी कर दो उतना अच्छा है क्योंकि हम सब के पीछे उसही दिन से काल पड़ा है जिस दिन से हमारा जन्म हुआ है।


महाराज श्री ने आगे कहा कि एक भक्त ने प्रशन किया है कि हम भक्ति करते हैं तो हमें परीक्षा क्यों देनी पड़ती है, कितनी परीक्षाएं हमको देनी हैं उन्होंने इसका सुंदर उत्तर देते हुए कहा कि कुछ बातें हमेशा याद रखनी चाहिए की इस संसार में सिर्फ सफल होने वालों को ही परीक्षा देनी पड़ती है, असफल होने वालों को तो देनी ही नहीं पड़ती वो तो आराम से घर बैठते हैं, परीक्षा उसही को देनी है जिसे सफल होना है। संसार रोकता है भक्ति करने से, संसार इसलिए रोकता है क्योंकि तुम रूक जाते हो। मीरा कहां रूक पाई थी, ध्रुव कहां रूक पाए थे, प्रह्लाद कहां रूक पाए थे, जब उनके सर पर धुन सवार हुई तो निकल गए थे वो भक्ति करने को। आप मुझे एक भक्त का नाम बता दो जिसे भक्ति करने से ना रोका गया हो।

महाराज श्री ने कहा कि अगर वाकई भक्ति करना चाहते हो तो सबसे बड़ी बात ये है कि तुम्हे पता होना चाहिए की तुम सही कर रहे हो। तुम्हारी आत्मा इस बात की गवाही दे की तुम सही कर रहे हो, तो फिर रूकना मत। गोपियां अगर गवालों के रोकने से रूक जाती तो वो कृष्ण को कभी प्राप्त नहीं कर पाती।



 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।



महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।