अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद कर रहा पूर्व सीएम का धरोहर

सीवान। प्रखंड के पटेढ़ी गांव के रहने वाले प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व.महामाया प्रसाद सिन्हा की धरोहर खंडहर में तब्दील होती नजर आ रही है। कभी सेनानियों व नेताओं से गुलजार रहने वाला उनका आवास आज वीरान पड़ा हुआ है। शानदार अतीत की कहानियों को समेटे उनका आवास वर्तमान में अपनी वजूद को ही बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। राजीनीतिक इच्छा शक्ति व जन प्रतिनिधियों की अनदेखी के चलते यह शानदार विरासत अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए जनप्रतिनिधि एक छोटे पंडाल में उनकी जयंती व पुण्यतिथि मनाकर खानापूर्ति कर लेते हैं। लेकिन उसी परिसर में महामाया बाबू की ढहती विरासत पर किसी का ध्यान नहीं जाता है। गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर शहर के राजेंद्र चौक पर उनकी मूर्ति स्थल पर झंडोत्तोलन होता है। लोग महामाया बाबू अमर रहे का नारा लगाना नहीं भूलते हैं। भले ही उनके शानदार इतिहास को भूला दिया जाए। गांव में बेहतर अस्पताल बनाने की उनकी सोच आजतक अधूरी है। राजनीतिक व प्रशासनिक विफलता का आलम यह है कि उनके विरासत को बचाने के लिए आज आम आदमी संघर्ष कर रहा है। उनके करीबी रहे दरौंदा प्रखंड के पिपरा गांव के वीरेंद्र ठाकुर ने बताया कि महामाया बाबू 1967 में बिहार के मुख्यमंत्री बने। यह आजादी के बाद प्रदेश में पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी। वे बिहार की राजनीति में त्याग व बलिदान की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने कभी भ्रष्टाचार से समझौता नहीं किया। जिसका परिणाम था कि उनकी सरकार चली गई। वैसे व्यक्ति की विरासत को बचाने के लिए संघर्ष की अंतिम सीमा तक जाएंगे।

रिपोर्टर

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